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Indu

हो सकता है की खुद को  पेशे से अधिवक्ता घोषित करती  इंदु सिंह की खबर पक्की हो या बात सच्ची हो लेकिन सोशल मीडिया पर भी लोग कहने लगे हैं की इस तरह की झूठ औरअफवाहों के बाज़ार बना के इंदु सिंह कौन सा आन्दोलन चला रही हैं….? अब रही बात तेल मालिश करने या करवाने की तो ये दो लोगों का आपसी सरोकार है… और एक व्यापार भी| यदि वो इस उक्त महिला की मालिश करने की मजदूरी के लिए लेबर कोर्ट में मुकदमा करके मदद करती तो संभवतः मै भी यथासंभव सहयोग देता| आप इसका नैतिक मसाले में छौंक क्यों लगा रही हैं? जिसे आप सत्य के साथ आगे बढ़ने का नाम दे रही हैं वो सोशल मीडिया की लफ्फाजी से ज्यादा और कुछ भी नहीं|

इंदु सिंह एक क्रांतिकारी महिला हैं ये बात तो मुझे मंजू मोहन जी के यहाँ हुए पहले साक्षात्कार से ही समझ आ गयी थी| लेकिन उनका भाजपा या गोविन्दाचार्य से कोई परिचय है ये मुझे परसों पता चला| चौबीस की शाम को लगभग छः- सात बजे के बीच जब गोविन्द जी जंतर मंतर पर गौ रक्षा आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के साथ मंत्रणा कर रहे थे तभी इंदु जी का आगमन हुआ| आने के दौरान गोविन्द जी भले ही कोई ध्यान न दिया हो लेकिन इंदु जी ने तुरंत उनके बगल वाले सहायक को हटा के कुर्सी कब्जाई| ऐसा लग रहा था की कुछ खास बात है| खैर जिस विदुषी महिला के सन्दर्भ में उनसे मुलाकात हुई उनके लिए मेरे मन में विशेष सम्मान है| इसलिए इंदु जी के ऊपर उस समय कोई संदेह करना उचित नहीं जान पड़ा| लेकिन देश के महापुरुष अन्ना हजारे के ऊपर की गयी इस बचकानी बयानबाजी से दुखी होकर मै कई तारों को जोड़ने का प्रयास कर रहा हूँ| इसके पीछे शायद मुझे इंदुजी की नासमझी या फिर किसी भगवा षड्तंत्र के तार मिल सकें|
इंदु जी खुद पेशे से वकील हैं और लोकतान्त्रिक व्यवस्था की शिखर संस्था के सम्मान में एक आन्दोलन चलाने का दावा भी करती हैं|
लेकिन उनके दावों में बचकानेपन को व्यवहारिक और सैद्धांतिक तौर पर न तो उचित माना जा सकता है न ही इस प्रकार गंभीरता से लिया जा सकता है|

खुद मंजू मोहन कहती हैं, “इस प्रकार की छीछल बातें हमारी सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ हैं| ऐसे लोगों के लिए तो एक रीड्रेसल सेल बना देना चाहिए| वहां पर इन लोगों की ऐसी शिकायतें सुननी चाहिए फिर मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों को इस गंभीर बीमारी पर विचार करना चाहिए| ताकि ऐसे लोगों का इलाज किया जा सके| सिर्फ सस्ता प्रचार पाने के लिए ऐसे बचकानी बयानबाजी का सिर्फ यही समाधान हो सकता है| उनसे पूछिए की अभी तीन दिन पहले अन्ना हजारे यहीं पर थे उस समय उन्होंने अन्ना से मिल के क्यों नहीं पूछा? अन्ना के पीछे इस तरह की बातें करना निहायत बेमानी है| मंजू जी इसमें आगे जोडती हैं की “अगर इंदु सिंह अपने भाजपाई होने का दायित्व निभा रही हैं तो उन्हें मोदीजी की पत्नी के साथ हुए अन्याय पर भी सवाल उठाना चाहिए”|

तेईस -चौबीस वाले आन्दोलन के लिए इसी प्रकार की छीछालेदर में बहुत से बयान वीर दावे करते रहे की अन्ना हजारे पचौरी के साथ जिंदल के जहाज में बैठ के आये थे| इसका पैसा जिंदल ने दिया आन्दोलन का खर्चा जिंदल उठा रहे हैं| लेकिन जब जनसत्ता के संपादक ओम  थानवीजी ने अन्ना की हवाई यात्रा का टिकट सामने लाकर रखा तो बयानवीरों ने बगलें झाँकनी शुरू कर दी|

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लोकसभा चुनावों के पूर्व अन्ना की जगह बहुत से लोगों ने मोदीजी के चरित्र हनन का प्रयास किया…. मोदीजी की गर्लफ्रेंड होने के भी दावे किये, उसकी चर्चा में लड़की की जासूसी करवाने के मामले को चटखारे लेकर सुनाया| इस सतही मसालेदार छीछालेदर पर देशवासियों ने भले ही कोई खास ध्यान न दिया हो लेकिन इससे प्रेरणा लेकर शायद इंदु सिंह भी शायद अपने स्तर पर वही सब कर रही हों.. लेकिन इसका मकसद क्या है जब तक स्पष्ट नहीं होता तब तक किसी को इंदु सिंह के आन्दोलन से कोई सहानुभूति कैसे हो सकती है?