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‘अंदाज-ए-बयां कल के बहुत खूब नहीं हैं।
शायद कि तेरे दिल में उतर जाय मेरी बात।
पता नहीं किस शायर की लाइंस हैं। पर इन्हीं खूबसूरत शब्दों से एम.ए.आलमगीर साहेब ने उस दिन अपनी बात शुरु की थी। मुझे बहुत साफ-साफ याद है। कुछ ही देर पहले मैंने उस मंच से टिप्पणी की थी। वह करीब पांच मिनट की संक्षिप्त सी बात थी। हां, उनकी शहादत से ठीक चौदह सप्ताह पहले, वह 2 मार्च 2014 का दिन था। और हम कांग्रेस मुख्यालय के सामने अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे  पर धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। सचमुच युएनआर्इ बचाओ आन्दोलन के इतिहास में वह उत्सव का दिन था। कुल छ: मिनट में ही उन्होंने आन्दोलन का रुख स्पष्ट कर दिया था। उन्हें सुनते हुए मुझे इतना अच्छा लगा कि स्पीच खत्म होने से पहले ही मैंने कुछ साथियों को छेड़ना नागवार समझा था। अब स्वतंत्र संवाद की मांग करने वाला वह मसीहा हमारे बीच नहीं है। पर इस बीच उनकी बातें बराबर मेरी स्मृतियों में उभरती रही हैं। शायद आपसे साझा कर इस रुह को कुछ राहत मिले।
अभिव्यक्ति की आजादी के मसले पर इस आन्दोलन की चर्चा के क्रम में कुछ अहम बातों को ध्यान में रखना जरुरी है। इस सन्दर्भ में एक बात जान स्वींटन की है। किसी जमाने में वह ‘द न्यूयार्क टाइम्स के चीफ आफ स्टाफ थे। उन्होंने न्यूयार्क प्रेस क्लब में अपने सम्मान में दिए गए भोज-समारोह को संबोधित करते हुए 1953 में कहा था, ‘विश्व इतिहास में आज की तारीख में अमेरिका में स्वतंत्र प्रेस नाम की कोर्इ चीज नहीं है। यह आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूं। आपमें कोर्इ भी ऐसा नहीं है, जो अपनी निष्पक्ष राय रखने की हिम्मत करे और यदि कोर्इ उसे प्रस्तुत करता है तो उसे पहले से ही पता होता है कि वह कभी नहीं छपेगी। मुझे हर सप्ताह इसलिए पैसे मिलते हैं कि मैं अपनी निष्पक्ष राय अपने अखबार से अलग रखूँ। सबको इसलिए वेतन दिए जाते हैं और अगर आप में से कोर्इ अपनी निष्पक्ष राय लिखने की मूर्खता करेगा तो वह पटरी पर दूसरी नौकरी तलाश करता मिलेगा। यदि मैं अपनी निष्पक्ष राय अपने अखबार के किसी अंक में डाल दूंगा तो चौबीस घंटे के अन्दर मेरी नौकरी चली जाएगी। अब युएनआर्इ की ऊर्दू सेवा से जुड़े रहे इस वरिष्ठ पत्रकार की दर्दनाक मौत को और एक कदम आगे का विकास मानने में हमें कोर्इ आपत्ति भी नहीं रही।
कृष्ण मेनन ने कहा था कि अखबार के प्रेस और जूट के प्रेस को उनके मालिक एक जैसा मानते हैं। यह मालिकों के अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति को इंगित करता है। असली मायनों में भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत समाजसेवा के कार्य की भांति हुआ था। टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व एडिटर गिरिलाल जैन ने कभी इसकी मिसाल पेश किया था। उन्होंने मालिक परिवार के एक हेकड़ीबाज युवक का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया और संपादक पद को अलविदा कह दिया था। क्या देश की आजादी के 67 साल बाद भी ऐसा ही है? यहां पूर्व प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कथन पर गौर करने से पत्रकारिता में आर्इ कमियों की ओर नजर पड़ती है। उन्होंने कहा था कि जिसे कोर्इ काम नहीं मिलता वह इस पेशे में आकर दलाली करता है। इन महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखकर ही आज इस मुíे की वास्तविक अहमियत समझा जा सकता है। आलमगीर साहेब की बातों पर नजर डालने से चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। उन्होंने विदेशी शकितयों द्वारा भारत में स्थापित न्यूज एजेंसी की सफलता के सापेक्ष स्वदेशी सूचना तंत्र पर कठोर आघात को कारगर ढंग से उजागर करने का कमाल कर दिखाया। बेशक उन्होंने हमारे युग का सबसे क्रांतिकारी कार्य किया है। उन्हें नहीं जानना इस युग की बड़ी भूल ही मानी जाएगी।
आज से 54 साल पहले युनाइटेड न्यूज आफ इंडिया का Üाृजन हुआ था। यह राष्ट्रहित में देश-दुनिया पर पैंनी नजर रखने के क्रम में निष्पक्षता सुनिशिचत करने का सार्थक प्रयत्न माना जाता रहा है। नाम के अनुरुप ही इसमें देश के मीडिया प्रतिषिठान साझीदार होते हैं। उस दौर में प्रिंट मीडिया का वर्चस्व था। परिणामस्वरुप समाचारपत्र प्रकाशित करने वाले समूहों ने अपने हिस्से के शेयर खरीदे। इस न्यूज एजेंसी को खड़ा काने में सत्तार्इस शेयरधारकों ने 10,189 शेयर खरीद कर कुल 10,18,900 रुपये जमा किये थे। यह अंग्रेजी हुकुमत के दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की जरुरतों को पूरा करने के लिये बनी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया के बरक्स एक विशुद्ध राष्ट्रीय एजेंसी की जरुरत को पूरा करती थी।
नेहरुजी का यह सपना आजादी के एक युग बाद जाकर ही साकार हो सका था। आजादी के बाद स्वतंत्र संवाद की Üाृंखला में इस विकास का अनूठा महत्व भी है। इस तथ्य को किसी भी सूरत में नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। सैकड़ों पत्रकारों और कर्मचारियों को रोजगार मुहैया कराने वाला यह संस्थान क्या सचमुच आज बेहद मुशिकल दौर से गुजर रहा है? यदि हां, तो इस ओर अनदेखी करना सदैव अनुचित ही माना जायेगा। यहां ध्यान रखना चाहिए कि भारत के पहले प्रधानमन्त्री ने नक्षत्रों की तरह सत्तार्इस सहयोगियों की पृष्ठभूमि में इसे खड़ा किया था। इन टिमटिमाते तारों पर आज भी कर्इ लोगों की नजरें टिकी हुर्इ है।
इस कार्य में पशिचम बंगाल के पहले मुख्यमन्त्री डा विधानचंद्र राय की विशेष भूमिका रही। गंभीर परामशोर्ं के बाद आखिर में उन्होंने इस योजना का संविधान तैयार किया था। इसके चेयरमेन एक विशेष क्रम में परिवर्तित होते रहें। ऐसा विधान भी किया गया था। फिर उन्हीं के नेतृत्व में इसे लागू भी किया गया। आनन्द बाजार पत्रिका समूह की इसमें एक चौथार्इ से कुछ ज्यादा की हिस्सेदारी रही। मिथिला के प्रतिनिधि राज दरभंगा की कंपनी ने इसमें सात फिसदी की अंशधारिता खरीदी, तो कलिंग के सम्मानित स्वर समाज ने भी करीब एक फिसदी का अंशदान सादर समर्पित किया था। ज्ञातव्य है कि उडि़या दैनिक समाज का स्वामित्व लोक सेवक मण्डल (सर्वेंटस आफ द पिपल सोसाइटी) के हाथों में है। उस कालखंड में इस एजेंसी को देश ने स्वतंत्र संवाद का पर्याय माना था। क्या फिर कभी ऐसा माना जाएगा? यह बेहद मुशिकल सा सवाल है। और यही प्रश्न इस आन्दोलन के मूल में है। आलमगीर साहेब का हुनर इस बात को साफ-साफ उकेरने में ही जाहिर होता है।
नैतिक रुप से इसके अंशधारक ही प्रबंधन के लिए जिम्मेदार भी होते हंै। इनमें आर्यावत्र्त जैसे प्रतिषिठत पत्र का प्रकाशन वर्षों पहले बन्द हो चुका है। फिर भी यह एजेंसी आरंभिक काल से ही बराबर तरक्की की राह पर अग्रसर रहा। वर्ष 2006 में यह सैकड़ों पत्रकारों समेत एक हजार से ज्यादा लोगों को जीविका उपलब्ध कराने में सक्षम साबित हुआ था। नो-प्रोफिट-नो-लास का बिजनस चलता रहा। पर आज यहां कामगारों की संख्या करीब आधी हो चुकी है। एकदिन इसे और उन्नत करने के लिए ≈दर्ू सेवा शुरु किया गया था। आलमगीर साहेब ने बताया था कि किस तरह राजीव गांधी ने दिलचस्पी लेकर यह कार्य किया। उनकी बातों में फिरकापरस्त और सांप्रदायिक ताकतों को नेस्तनाबूद करने का व्यौरा मिलता है। उन्होंने संस्थान के अंदर बैठकर इसे नष्ट करने में लगे लोगों के बारे में भी खुलकर कहा था। दुर्भाग्य है कि इस षडयंत्र का सार्वजनिक मंच से खुलासा करने के बाद वह सौ दिन भी जीवित नहीं रहे। क्या यह दाग भी धुलने योग्य है? इसमें मुझे शक है।
इस मुíे की तह में पहुंचने के लिए गंभीर अध्ययन की जरुरत होगी। मीडिया की रंगीन दुनिया के अन्दर की सच्चार्इ जानकर ही युएनआर्इ बचाओ आन्दोलन से जुड़ी समस्याओं की गंभीरता का खुलासा होता है। पिछले साल दानिश बुक्स ने एक पुस्तक छापी थी, सफेदपोशों का अपराध। अर्थशास्त्र के प्रोफेसर गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक ब्रजकुमार पांडेय की इस किताब में एक पाठ का शीर्षक है, मीडिया की दुनिया। इसमें एजेंसी के सत्तार्इस अंशधारकों में से कुछ खास नाम उनके उल्लेखनीय कार्यों के साथ वर्णित हैं। इसे पढ़कर भारत के पहले राष्ट्रीय एजेंसी की दुर्दशा के विषय में बेहतर समझने की गुंजाइश बनती है। ऐसी साफगोर्इ से यहां कह पाना मेरे बूते की बात नहीं है।
पिछले सात वर्षों में यह संस्थान सतत मृत्यु की ओर बढ़ती रही है। आज युएनआर्इ प्रबंधन में लंबे अर्से से काबिज रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी और विश्वास त्रिपाठी की युगल-जोड़ी इस दशा के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एजेंसी के तीन हजार करोड़ की सम्पत्ति हड़पने का प्रयास किया है। पहली नजर में यह भूमाफिया का काम प्रतीत होता है। ऐसा करने में कोर्इ कसर बाकी नहीं रखा गया है। अबतक इसे बचाए रखने में सर्वोच्च न्यायालय और इस आन्दोलन के सूत्रधार समरेंद्र पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। यहां आज भी चातक स्वाति की बूंदों से वंचित है।
न्यायालय में एबीपी समूह ने उन्हीं बूंदों को उपलब्ध कराने का भरोसा दिया था। पर यह इस संकट से उबरने का असफल प्रयास साबित हुआ है। इसकी वजह इस प्रकरण में ढ़ेर सारी समस्याओं की मौजूदगी है। आज रायटर का करीब सात करोड़ रुपये का बकाया है। कर्मचारियों के पीएफ का भी करीब इतने ही रकम का घोटाला उजागर हुआ था। इस विषय में प्रबंधन के खिलाफ रिपार्ट भी दर्ज है। यहां यौन उत्पीड़न और दलित उत्पीड़न के भी संगीन मामले हैं। संस्थान के निदेशक विश्वास त्रिपाठी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। उनके खिलाफ लाखों रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला प्रकाश में आया है। और इन सब के विरुद्ध खड़ा होने वाले या तो एजेेंसी से गायब हो जाते हैं या फिर इस दुनिया से ही। ऐसा कब तक चलेगा? क्या ऐसी दशा में भी प्रबंधन के अलावा सरकार की मंशा पर प्रश्न नहीं उठेगा? इसका जवाब सेबी की चिट्टी में अब नजर आता है। हालांकि राष्ट्रीय महिला आयोग और दूसरी अन्य सरकारी एजेंसियों ने इन मामलाें का संज्ञान लेकर उल्लेखनीय कार्य किया है। हाल ही में दिल्ली पुलिस की विजिलेंस सेल द्वारा इन मामलों में जांच भी शुरु किया गया है।
सहारा प्रमुख को जेल भेजने के बाद अब सेबी ने इस मामले में कार्यवाही किया है। यह वही संस्थान है, जिसने शारदा (सारधा) और सहाराश्री की पोल खोलकर आम लोगों (निवेशकों) को राहत पहुंचाया है। सेबी ने ‘सेव युएनआर्इ मुवमेंट को इस मसले में पत्र लिखकर सूचित किया है। पाठक बताते हैं कि एनबी (नव भारत) प्लांटेशन नामक इस चिट-फंड कम्पनी के सैकड़ों करोड़ का घोटाला सामने आया है। युएनआर्इ के विवादित चेयरमेन आज बेहद गंभीर कानूनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब अपने भी उनका साथ छोड़ने लगे हैं। हाल ही में इस विषय में सनसनीखेज खबरें प्रकाश में आर्इ है। कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी इस एजेंसी के लंबे समय से चेयरमेन हैं। बीते दिनों मीडिया रिपोर्ट में उनके इस्तीफे जैसी एक खबर आर्इ। सबलोग आशा कर सकते हैं कि किसी दिन इस त्यागपत्र की पूरी कहानी भी सामने आएगी।
सैंतालिस सालों तक इस एजेंसी ने दुनिया भर के लोगों को ताजा घटनाक्रम से जोड़कर रखने में अहम भूमिका निभार्इ। बाद में सफेदपोशों ने इस एजेंसी को अंदर से खोखला करने का लक्ष्य साधना शुरु किया। जाहिर सी बात है कि एक अर्से से युएनआर्इ प्रबंधन में अपराधियों का गैंग काबिज रहा है। अब इस बात का अंदाजा लगाना खासा मुशिकल भी नहीं रहा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि युएनआर्इ से जुड़ी खबरें इसी एजेंसी के लिए कार्यरत पत्रकारों और कर्मचारियों को वर्ष 2007 से बाहरी श्रोतों से मिली है। डीएनए ने 32 करोड़ 4 लाख में हुए अंशधारिता के खरीद-फरोख्त का वह व्यौरा प्रकाशित किया था, जिसे बाद में एबीपी समूह उच्चतम न्यायालय लेकर चुनौती दी। अब चेयरमेन के त्यागपत्र की यह खबर भी युएनआर्इ श्रोत से नहीं है। गौर करने की बात है कि आजकल एक वेब पोर्टल के लिए कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार राजीव शर्मा की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है।
विभिन्न स्तरों पर इससे जुड़े मसलों को लेकर न्याय की गुहार का असर देखा जा रहा है। इस क्रम में आलमगीर साहेब अंतिम जन साबित हो सकते हैं। आज उनकी सुध लेने वाला कोर्इ नहीं है। क्या ऐसी दशा में लोकतंत्र में आस्था रखने वालों को संतुषिट मिलेगी? सुनील दत्त और देवीलाल जैसे प्रभावी नेताओं के कर्मवीर पुत्रों को जेल भेजने वाली व्यवस्था क्या कभी इस शहीद को न्याय देगी? इस आन्दोलन से जुड़े इन्हीं प्रश्नों ने आज प्राय: सभी शेयरधारकों का मुंह बन्द कर रखा है। पर इतना तो साफ हो गया है कि प्रबन्धन में आए दोषों के कारण ही कर्मचारी संगठन ने युएनआर्इ बचाओ अभियान का सूत्रपात किया। वास्तव में इस संवाद एजेंसी को बचाने की नैतिक जिम्मेदारी इसके अंशधारकों की ही होती है।
क्या एक क्रांतिवीर पत्रकार की शहादत के बाद प्रकाश की नर्इ किरण फूटी रही है? क्या अब यह एहसास गहराने लगा है कि आने वाले समय में इसके प्रबंधन का सबसे जटिल संकट दूर होगा? इस बीच लोक सेवक मण्डल ने इस मसले में गंभीरता दिखार्इ है। आखिरकार यह चर्चा एक्जीक्युटिव काउंसिल की बैठक तक पहुंच चुकी है। बीते 26 नवम्बर को बड़ौदा में हुर्इ बैठक में दीपक मालवीय को इस मामले की जिम्मेदारी सौंपा गया है। सोसाइटी के पहले उपाध्यक्ष उत्कलमणि गोपबन्धु दास ने नौ दशक पूर्व समाज का प्रकाशन शुरु किया था। एक अर्से से भीमसेन यादव और दीपक मालवीय इस प्रतिषिठत पत्र का प्रबंधन देख रहे हैं। देश-दुनिया आज इसके एक दर्जन संस्करणों का बेहतरीन प्रकाशन देखकर उनके कौशल से रु-ब-रु होती है। समाज में ‘मजिठीया वेज लागू कर उन्होंने इसे साबित किया है। लाल-बाल-पाल के शिष्यों से ही पत्रकार भी बेहतर भविष्य का आशा करते हैं। मालवीय ने शारदा चिट-फंड घोटाले में संलिप्त भुवनेश्वर प्रेस क्लब से जुड़े मधु मोहंती के खिलाफ कड़ा रुख अखितयार कर प्रशंसनीय कार्य किया है। परंतु आज की दुरुह परिसिथति में युएनआर्इ का संकट दूर करना चुनौतियों भरा काम ही है।
खबरपालिका को शासन-व्यवस्था का चौथा अंग कहा जाता है। श्रमजीवी पत्रकारों के इस आन्दोलन से स्पष्ट हो चुका है कि आज फिर कहीं अभिव्यकित की आजादी खतरे में है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए कोर्इ शुभ संकेत नहीं है। पर यहां इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाविष्य में लोक सेवक मण्डल की तरह ही कोर्इ और प्रभावी अंशधारक भी अभिव्यकित की आजादी के नये शहीद को याद करने का काम करे।
कौशल किशोर
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